मोदी जी भाषणबाजी कर रहे और किसान गोली खा रहे: कांग्रेस

भाजपा कभी गांधी जी के आदर्शों और मूल्यों पर दावा करने का कोई मौका नहीं गंवाती। लेकिन, जब करने की बारी आती है तो भाजपा सरकार को अपने बर्बर कृत्यों से गांधीजी के संदेशों को धता बताने और अपना ढोंग उजागर करने में भी समय नहीं लगता। कल राजधानी में किसानों के मार्च पर सरकार की हरकतें इसी विडंबना को जाहिर कर रही थी, क्योंकि मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ अपनी मांगों के साथ 2 अक्टूबर को राजधानी में घुसने की कोशिश कर रहे हजारों किसानों पर डंडे बरसाये गये, पानी की बौछारें छोड़ी गयी तथा उन पर आंसू गैस के गोले तक दागे गये। गांधी जयंती और शांतिपूर्ण विरोध का संदेश सरकार भूल गयी, उसने हजारों पुलिसकर्मियों को किसानों की रैली रोकने तथा उनको तितर-बितर करने के लिये लगा दिया, ताकि किसानों की आवाज़ किसी भी कीमत पर दबायी जा सके।

देश भर में किसानों के बीच उबाल खा रहे गुस्से को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। महाराष्ट्र और गुजरात से लेकर राजस्थान और दिल्ली तक किसान अपनी बात कहने के लिये लगातार विरोध-प्रदर्शन करने पर मजबूर हो रहा है। लेकिन उसकी परेशानियों पर ध्यान देने की बजाय उनको अनसुना किया जा रहा है, जो कि किसानों के लगातार बढ़ते भारी संख्या में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों से साबित होता है। दर्ज किये गये किसान विरोधों से जुड़े एनसीआरबी आंकड़ों से पता चलता है कि 2014 में यह संख्या 628 थी जो 2015 में बढ़कर 2683 हुई और 2016 में यह 4837 पर पहुंच गई। उनकी परेशानियों और चिंताओं को न केवल नज़रअंदाज किया गया है बल्कि इस समुदाय की आवाज़ को कुचलने के लिये सरकार ने हिंसा और बलप्रयोग का सहारा लेने में भी संकोच नहीं किया। केंद्रीय कृषि मंत्री के बयान से सरकार की उपेक्षा का साफ पता चलता है जब उन्होंने किसानों के विरोध-प्रदर्शन का मजाक उड़ाते हुए कहा कि ये सब मीडिया में आने के लिये किया जाता है।

हालांकि, प्रधानमंत्री अपनी उपलब्धियों का ढोल पीटते रहते हैं, लेकिन खबरों से पता चलता है कि भाजपा ने किसानों से किये हर वादे को झुठला दिया चाहे वो किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा हो, एमएसपी बढ़ाने का वादा हो या फिर कृषि सुधारों का वादा हो, हर चुनावी वादे बुरी तरह विफल हो गए हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के 70वें दौर के अनुसार केवल 6 प्रतिशत किसान ही एमएसपी पर अपना उत्पाद बेच पा रहे हैं। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि ज्यादातर फसलों की कीमतें एमएसपी से लगातार कम रही हैं और कृषि विकास अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। यह यूपीए-2 के समय के रिकॉर्ड से बिल्कुल उल्टा है, जहां औसत वार्षिक एमएसपी विकास दर एनडीए सरकार के 3.6 प्रतिशत के मुकाबले 19.3 प्रतिशत थी। यहां तक कि तमाम विरोध प्रदर्शनों के बाद भी जो अंतरिम वादे और समझौते हुए वो भी चुनावी वादों की तरह नाकाम साबित हुए, जिनको तुरंत फायदा उठाने के लिये यूं ही कर दिया गया था। किसान कर्ज माफी का भरोसा दिये जाने के बावजूद कुछ नहीं किया गया, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने कंपनियों के फंसे हुए कर्ज का 3,17,000 करोड़ रुपया बट्टे खाते में डाल दिया।

पिछले 4 वर्षों में भाजपा सरकार ने कई बार ये साबित कर दिया है कि वो सिर्फ अमीर पूंजीपतियों और बड़ी कंपनियों वाले उद्योगपतियों की सरकार है, उसे किसानों और मजदूरों की कोई परवाह नहीं। किसानों के संकट में सुधार का कोई संकेत नहीं दिखता है, इतना तो साफ है कि इस सरकार के लिये ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा सिर्फ ढोंग का जरिया भर है।

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